मराठाकालीन तिरखेड़ी पोवार जमींदारी और पुरातात्विक अवशेष

 मराठाकालीन तिरखेड़ी पोवार जमींदारी और पुरातात्विक अवशेष

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 १.एक उल्लेखनीय जमींदारी               ----------------------------------------

       मराठा शासनकाल में वैनगंगा क्षेत्र में कृषि उद्योग का विकास करने के उद्देश्य से शासन को युद्ध सहयोग करनेवालों को जमींदारी बहाल करने की परंपरा देखने को मिलती है. भोंसले शासनकाल में जो शेकड़ो नई जमींदारियां अस्तित्व में आई उनमें से एक विख्यात जमीनदारी के रुप में  उल्लेखनीय है तिरखेड़ी जमींदारी !

२.तिरखेड़ी जमींदार बाड़ा

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        तिरखेड़ी जमींदारी यह  वर्तमान गोंदिया जिले की सालेकसा तहसील में है. मराठा  शासनकाल में घने वनों में बसी हुई जमींदारियों में से यह सबसे बड़ी जमीनदारी थी ऐसी कल्पना यहां के जमींदार बाड़े की भव्य वास्तु देखकर स्वाभाविक रुप से आ जाती है.

         यहां का जमींदार बाड़ा सात एकड़ भूमि में तथा उत्तराभिमुख है.

२-१.चतुर्सिमा

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        उत्तर मुखी इस जमींदार बाड़े के पूर्व में नांग तलाव, पश्चिम में लगभग एक कि.मी.पर बाघ नदी,उत्तर में खेती तथा दक्षिण में तिरखेड़ी गांव बसा हुआ है.

२-२.मुख्य प्रवेशद्वार

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        जमींदार बाड़े का जहां विशाल आकार का लकड़ी से बना हुआ मुख्य प्रवेशद्वार है उस इमारत में हत्तीखाना और नगारखाना है. हत्तीखाना यह हाथिन को  बांध के रखने की जगह थी. नगारखाने में शिपाई और पिल्लेवान रहा करते थे.१९६०के दशक में हाथिन की मृत्यु हो गयी. उस समय जमींदार बाड़े में गहरा दुःख व्याप्त हो गया था.हाथिन का दफन विधी  पूरे गांव ने श्रद्धापूर्वक भजन-कीर्तन के साथ किया.जमींदार बाड़े की यह भव्य इमारत अब भग्नावस्था में है.

२-३.कचहरी

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          पहली इमारत के बाद भव्य आंगण और उसके बाद जो दूसरी इमारत है उसे कचहरी के नाम से संबोधित किया जाता था. इस इमारत की छपरी में लकड़ी का एक झूला हुआ करता था. इस इमारत को अब रहने की दृष्टि से  सुधारा गया है.इसमें जमींदार के वंशज श्री.गजानन कटरे यह परिवार सहित निवास करते है .

२-४.पांच मंजिल का जमींदार बाड़ा

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 कचहरी के दक्षिण में विशाल आंगन और उसके बाद पांच मंजिला जमींदार बाड़ा है.यहां जमींदार का परिवार निवास करता था. इस इमारत में अभी जमींदार के वंशज श्री.मधुकर कटरे इनका परिवार सहित निवास है. इस इमारत को  सुरक्षित रखा गया है.

         इस पांच मंजिला बाड़े में नीचे तलघर है. तलघर का उपयोग खजाना रखने के लिए किया जाता था.  तलघर अब मिट्टी से बूज गया है, लेकिन तलघर में जाने का प्रवेश द्वार आज भी  इत्मिनान से यहां तलघर होने की साक्ष्य दे रहा है.   

        तलघर के ऊपर यानि जमीनी स्तर पर जो इमारत है उसमें बीच में माचघर है और माचघर के सामने के हिस्से में दो तथा पीछे के हिस्से में दो छपरी है. इस भवन के आगे के आंगन में बगीचा हुआ करता था.इसी आंगन में एक तरफ बाघदेव तथा दूसरे तरफ पटेल देव का बोहला है.

          जमीनी स्तर पर बनीं हुयी इस इमारत के ऊपर और तीन मंजिल आज भी अच्छे हालात में है.संपूर्ण इमारत इंटों को मिट्टी की जुड़ाई करके बनाई गयी है. इस मुख्य बाड़े में लगे हुए दरवाजे और खिड़कियों की कूल संख्या २५०है.

२-५.कनघर

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        बाड़े के पांच मंजिला इमारत के दक्षिण में एक आंगण है और बाद में कणघर है.यह कणघर दो मंजिला हैं. पहिली मंजिल की दीवारें  विशालकाय पत्थर की बनी हुई है जो लगभग तीन फिट चौड़ी है.दूसरी मंजिल  इंटों से बनी हुई है.ये दिवाले भी लगभग साढ़े तीन फिट चौड़ी हैं. 

    यह इमारत अब खंडहर में तब्दील हो गयी है.इस कनघर को लगके दक्षिण में सब्जी पकाने की  बड़ी बाड़ी है.बाड़ी के बाद में बस्ती बसी हुई है.

२-६.पशुओं के कोठे

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      हत्तीखाना और कचहरी के पूरब-पश्चिम में गाय-बैल आदि पशुधन को बांधने के लिए बड़े-बड़े कोठे और कोठों में तनस रखने के लिए  उनमें पाटण बनी हुई थी.वर्तमान में यह पाटण युक्त कोठे लगभग धराशाई हो गए हैं.

३.उपसंहार

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     जमींदार बाड़े में लगे हुए कांच के बड़े-बड़े झूमर और यहां के कलाकारी युक्त लकड़ी के मजबूत दरवाजे और खिड़कियां आज भी   मराठाकालीन और ब्रिटिशकालीन वास्तुकला और साथ ही साथ जमींदारों के वैभव की साक्ष्य देते है.भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा इसप्रकार के पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण के लिए उचित कदम उठाने चाहिए, ऐसा भाव  इन  इमारतों का अवलोकन करते समय हर किसी के मन में अनायास ही प्रगट हो जाता है.


#इतिहासकार प्रचार्य ओ.सी.पटले

# श्री हनुमान जयंती,शनि.16/4/2022.

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