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*36 कुल पोवार (पंवार) समाज की सांस्कृतिक धरोहर सरंक्षण युवाओं की स्वयंस्फूर्त प्रेरणा

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 *36 कुल पोवार (पंवार) समाज की सांस्कृतिक धरोहर सरंक्षण युवाओं की स्वयंस्फूर्त प्रेरणा*       छत्तीस कुल पोवार (पंवार) समाज की सांस्कृतिक धरोहर तथा परंपरायें केवल कुछ पीढ़ियों या शताब्दियों की नहीं अपितु हजारों वर्षों से चली आ रही अनमोल सामाजिक विरासते है। इस विरासतो में हमारे कुलों की विशिष्ट पहचान प्रमुख है  क्योंकि यह हमारे अस्तित्व और गौरव का आधार है। हमारे समाज के छत्तीस कुल रहे हैं।              *"छत्तीस कुल पहचान ही हमारी सामाजिक व्यवस्था में समृद्ध संस्कारो की मेरुदंड हैं।*"       यही पहचान हमारे समाज की प्राचीनता तथा विशिष्टता के दर्शन कराती हैं । यह पहचान हमारे पूर्वजों के त्याग, बलिदान और शुद्धता का परिचय कराती है।           यह विरासत केवल कुलनामों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें हमारी ऐतिहासिक पहचान की विशेषताएं समाहित है। आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व परमार वंशीय राजा भोज ने अपनी राजधानी को उज्जैन से स्थानांतरित कर ‘धार’ नगरी में स्थापित की थी। इस ऐतिहासिक स्थल को ही पंवार (पोव...

पंवार(पोवार) समाज का परिचय और इतिहास

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 पंवार(पोवार) समाज का परिचय और इतिहास पंवार(पोवार) समाज का परिचय और इतिहास         पंवार(पोवार) जाति पुरातन छत्तीस क्षत्रियों कुलों का एक संघ है। प्राचीन काल में ये कुल अलग-अलग पौर याने जनपद के प्रमुख हुआ करते थे इसीलिए इन्हें पौर राजा या पोवार तथा कालांतर में पंवार कहा जाने लगा। प्राचीन ग्रंथों में इन्हें ही छत्तीस पुरातन क्षत्रिय या राजपुत्र माना गया है। इनका मूल निवास अखंड भारत वर्ष के उत्तर पश्चिमी यानि आधुनिक ईरान से लेकर मगध से लेकर नर्मदा के क्षेत्र तक फैला हुआ था। कालांतर में अवंती एक शक्तिशाली राज्य बना और इसके राजाओं जैसे सम्राट विक्रमादित्य ने इस सम्पूर्ण क्षेत्र पर शासन किया।  वैदिक कालिन अस्तित्व वैदिक काल में पोवार जाती के लोग प्राचीन पौर (वैदिक जाती पुरु ) होने के प्रमाण मिले है। उन पौर लोगो को अंग्रेजी में Powar, Puar,  Puvar , Pravara , Ponwar, Panwar आदि लिखा मिलता है। ऋग्वेद का यह मन्त्र दर्शाता है की वैदिक समय में पौर थे ।                                ...

पोवार समाज का अस्तित्व और उसकी मूल पहचान का संरक्षण

 पोवार समाज का अस्तित्व और उसकी मूल पहचान का संरक्षण          हमें सभी जातियों में एकता का भाव बिलकुल रखना चाहिए। सभी जातियों को संगठित होकर रहना जरुरी हैं। हम छत्तीस कुल के पोवारों ने हमेंशा से अपनी पहचान भी कायम रखी हैं और संगठित भी रहें हैं। 1700 के बाद मध्यभारत में और उसके पहले भी सैकड़ों वर्षों में। हां कुछ कुल मिलते बिछड़ते रहें हों पर अपनी नाम और पहचान को यथावत रखना भी बड़ी बात रही होगी।            1700 के आसपास हम लोग 36 कुल के संघ के रूप में थे फिर भोयर जाति ने खुद को पवार लिखने का प्रस्ताव पास कर हम पोवारों से विलीन होने का प्रस्ताव किया जिसका व्यापक विरोध भी था पर कुछ लोगों ने उनसे एकता स्वीकार कर ली। अब उनके सौ कुल और हमारे छत्तीस कुल अतीत में कितने जुड़े थे ये शोध का विषय हैं क्योंकि 1700 से 1965 तक दोनों जातियाँ में आसपास रहकर भी एक दूसरे से उतने ही सम्बन्ध थे जितने की पोवार और लोधी तथा कुनबी जाति से।          आज से कुछ साल पहले भोयर और पोवार जातियों को मिलाकर पवार(1982 से) और भोयरी और पोवारी ...

पोवारी साहित्य सरिता

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  पोवारी साहित्य अना सांस्कृतिक उत्कर्ष द्वारा आयोजित पोवारी साहित्य सरिता भाग ९१ -१०८          आयोजक   डॉ. हरगोविंद टेंभरे श्री शेषराव येळेकर श्री यशवंत कटरे   मार्गदर्शक श्री. व्ही. बी.देशमुख      ******************************         पोवारी लोक साहित्य : संकलन आवश्यक   भविष्य मा पोवारी बोली ला भाषा बनावन को प्रश्न जब् उत्पन्न होये तब् पोवारी भाषा वैभव की समीक्षा नवनिर्मित साहित्य व लोकसाहित्य को आधार पर होये. पोवारी भाषा को लोकसाहित्य का ‌विवाह गीत , बिदाई गीत , अंगाई गीत , परहा का गीत , बारी , लावणी , झड़ती , पोवाड़ा , , कथा ,‌ हाणा , कहावत असा विविध प्रकार सेती. येव सब लोक साहित्य धीरु -धीरु विलुप्त होय रही से. मातृभाषा प्रेमियों द्वारा , विलुप्ति को कगार पर जेव लोकसाहित्य पहुंच गई से वोको लिखित संकलन करनो या वर्तमान की प्रमुख आवश्यकता से.मातृभाषा को महत्व निम्नलिखित से -   मातृभाषा पोवारी आमरी पहचान l मातृभाषा पोवारी   याच आमरी शान l या आय ...