पंवार धर्मोपदेश (1892) एवं छत्तीस कुलीन पंवार(पोवार) समाज का संगठनात्मक विकास
पंवार धर्मोपदेश (1892) एवं छत्तीस कुलीन पंवार(पोवार) समाज का संगठनात्मक विकास “पँवार धर्मोपदेश” (1892) में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि क्षत्रिय पोवार (पंवार) समाज के केवल छत्तीस कुल होते हैं, और प्रत्येक कुल एक पवित्र धाम के समान है, जिसे कभी भी भुलाया नहीं जाना चाहिए। हमारे समाज के कुलों के नाम हैं -क्षत्रिय पोवार(पंवार) समाज के छत्तीस कुल : १.अम्बुले(अमुले), २.बघेले(बघेल), ३.भगत, ४.भैरम, ५.भोएर, ६.बिसेन, ७.बोपचे, ८.चौहान, ९.चौधरी, १०.डालिया, ११.फ़रीदाले, १२.गौतम, १३.हनवत, १४.हरिनखेड़े, १५.जैतवार, १६.कटरे (गोंदिया-गोरेगांव क्षेत्र में देशमुख भी लिखते हैं.), १७.कोल्हे, १८.क्षीरसागर, १९.पटले(वारासिवनी-कटंगी क्षेत्र में देशमुख भी लिखते हैं.) २०.परिहार, २१.पारधी, २२.पुण्ड ,२३.राहंगडाले, २४.रणमत्त, २५.रिनायत, २६.राणा(राणे), २७.रणदेवा, २८.रजहांस, २९.रावत, ३०.शरणागत, ३१.सहारे, ३२.सोनवाने, ३३.ठाकरे(ठाकुर), ३४.टेम्भरे , ३५.तुरकर, ३६.येड़े । इसी सिद्धांत के आधार पर उस समय पंवार जाति सुधारणी सभा का गठन किया गया। इस सभा का मुख्य उद्देश्य गांव और शहरों में निवासरत स...